क़व्वाली सुनना कैसा
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🥀 *क़व्वाली सुनना कैसा*🥀
क़व्वाली सुनना हमारे बुजुर्गाने दीन से साबित है
मगर वो क़व्वाली आज की क़व्वाली की तरह नहीं होती थी
बल्कि वो कलाम क़ुरआन व हदीस की रोशनी मे हुवा करता था
ना ही उसमे ढोल और बाजा होता
था और ना ही उसमे तालीया सिटी बजती थी, ढोल और बाजा शुरू से ही इस्लाम मे हराम है।
हुजूर सलल्लाहु अलैह व सल्लम ने इरशाद फरमाया
👉ज़रूर मेरी उम्मत मे ऐसे लोग होने वाले हैं जो ज़िना,रेशमी कपड़े,शराब और बाजो ताशो को हलाल ठहरायेंगे।
📖हवाला- सही बुखारी जिल्द 2,किताबुल अशरिबाह,सफा-837
क़यामत के करीब नाचने गाने वालीयो और बाजो ताशो की कसरत हो जायेगी
📖हवाला- तिर्मीजी,मिश्रित,बाब अशरातुस्साअह- सफा 470
मगर आज की क़व्वाली मे बाजा ढोल न हो तो उसे क़व्वाली ही नहीं कहा जायेगा इसलिए के आज लोगों ने ढोल बाजे का नाम ही क़व्वाली रख दिया है
मगर वो औरत जिसके उपर पर्दे का हुक्म है आज वही औरत बेपर्दा होकर अपने हुस्न को जाहिर करके मर्द हज़रात के सामने क़व्वाली गाती हुई नज़र आती है
अरे औरत तो औरत ,औरत की आवाज़ भी औरत है यानी औरत को चाहिए के अपनी आवाज़ को भी मर्दो से पोशीदा रखे
मगर आज वही औरत रंगरेलीयो के मैदान मे उतरकर मर्दो को मौज मस्ती मे लुभाती है
सिटीया और तालीयां बजती है,
और ये सब बुजुर्गों के उर्स के नाम पर होता है और इसी का नाम आज इन लोगों ने कव्वाली रख दिया है
लाखों रूपये खर्च करके गुनाहों का ये बाजार लगवाकर इसे सवाब का नाम दिया जाता है
नये लोग आये ,नयी नस्लें आई तो नये कारनामे भी बढ़ गये
असल क़व्वाली वो है
जिसका कलाम क़ुरआनो हदीस की रोशनी मे हो
ढोल, ताशे ,बाजे न हो
क़व्वाली गाने वाला बा-शरा हो
मगर आज क़व्वाली मे कुफरिया अल्फ़ाज़ डालकर
वो कलाम गाया जाता है जिससे हमारे ईमान को भी खतरा है
जिनके चेहरो पर दाढ़ी तक नहीं रहती वो क़व्वाली मे सुन्नते मुस्तफा का दर्स देते हैं और दर्स क्या देंगे इसलिए के ये क़व्वाली खुदा और उसके रसूल सलल्लाहु अलैह व सल्लम के लिए नहीं हुवा करती और ना ही औलिया ए किराम के लिए होती है बल्कि हक़ीक़त तो ये है के इनका मक़सद दीन की बात बताना नहीं बल्कि सिर्फ पैसा कमाना होता है
बहर हाल मेरी तमाम सुन्नी अवाम से गुजारिश है इस तरह से कोई भी प्रोग्राम हो ना जाये और ना ही रखे अगर तुम्हे रखना ही है तो किसी सुन्नी आलिमे दिन को बुलाकर जलसा रखे जिसमे जो भी बात होगी क़ुरआनो हदीस की रोशनी मे होगी और एक बात बता दूं उल्माए दीन की ज़ियारत करना हुज़ूर सलल्लाहु अलैह व सल्लम की ज़ियारत करने जैसा है और आप इन्हें जो नज़राना देंगे
उसमें से कुछ पैसा मदरसो मे भी जाता है जहां दीन के तलबा पर खर्च होता है क्योंकि जो भी नामवर मुक़र्रीर होता है उसका एक मदरसा भी होता है
तो बहर हाल अपने पैसो को इस तरह जाया ना करो
उसको अच्छे कामो मे खर्च करो
अपने पैसो से जन्नत खरीदो दुनिया की मौज मस्ती नहीं
क्योंकी ये मौज मस्ती तुम्हे जहन्नुम मे ढकेल देगी
इस्लाम को समझो
इस्लाम खेल कुद,ताशे बाजे,मौज मस्ती का नाम नहीं है
इस्लाम को अगर समझना है तो
उल्माए अहले सुन्नत से राब्ता करो
या अल्लाह हमे हक़ समझने, ओर हक़ पर अमल करने की तौफीक़ अता फरमा
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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*
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