उर्स कहते किसको है**उर्स का मत़लब क्या होता है**उर्स मनाया क्यों जाता है**इस से फायदा क्या है

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*🥀 उर्स कहते किसको है*
*उर्स का मत़लब क्या होता है*
*उर्स मनाया क्यों जाता है*
*इस से फायदा क्या है 🥀*



🔛 आज के माहौल में ये वो सवालात है जो लोगो के ज़ेहन में अक्सर पैदा होते है या पैदा न हो तो कुछ बद अक़ीदा उनके ज़हनों में ये सवाल पैदा करते है।
उर्स के लफ़्ज़ी मायने होते है *शादी* के और शादी के मायने होते है ख़ुशी का दिन, किसी भी वली की तारीखी विसाल जो होती है उसको हम उर्स तामील करते है यानी कहते है की आज ख़ुशी का दिन है शादी का दिन है।
लेकिन ये बड़ी अजीब बात लगती है गौर करें की विसाल की तारीख तो गम का दिन होना चाहिए ख़ुशी का दिन नहीं आज की तारीख में कोई अल्लाह का वली हमें छोड़ के गया तो ये ग़म का दिन होना चाहिए हमें उस दिन ग़म मानना चाहिए न की ख़ुशी।

तो फिर वजह क्या है कि हमारे उल्माए दीन ने उनके विसाल के दिन को ख़ुशी का दिन क़रार दिया (यानी उर्स का दिन कहा) उसका सीधा साधा मत़लब ये है कि एक अल्लाह का वली अपनी सारी ज़िन्दगी अपने महबूब के दीदार के इंतज़ार में गुज़ार देता है एक आशिक़े रसूल सारी ज़िन्दगी ये तमन्ना करता है कि पूरी दुनिया की दौलत भी ख़र्च करनी पड़ जाए तो एक बार प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के चेहरे की ज़ियारत हो जाये और अल्लाह के रसूल की एक हदीस भी है कि सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेरे बाद कुछ लोग वो आएंगे कि मेरे दीदार की ख़ातिर सारी दुनिया की दौलत ख़र्च करने को तैयार हो जायेंगे अगर वो मेरी ज़ियारत करने की तमन्ना रखेंगे और उनसे कहा जाएगा कि पूरी दुनिया ख़र्च कर तो हुज़ूरﷺ के चेहरे की ज़ियारत हो जाएगी तो वो पूरी दुनिया ख़र्च कर देंगे सिर्फ मेरे दीदार की एक झलक पाने के लिए (सुब्ह़ान अल्लाह)

तो एक अल्लाह का वली होता है या एक आशिक़े रसूल होता है जिसकी तमन्ना होती है कि मैं अपने नबी को देखूं और जिसको रसूल दिख जाए दीदार हो जाये उसकी ज़िन्दगी कामियाब हो जाती है क्योंकि आक़ा ने फ़रमाया *जिसने मेरी क़ब्र की भी ज़ियारत कर ली उस पर मेरी शफ़ाअत  वाजिब हो गई* तो जब एक अहले ईमान नबी की क़ब्र को देखे तो शफ़ाअत वाजिब हो जाती है तो रसूल के चेहरे ज़ेबा को देखे तो जन्नत का मिलना यक़ीनी है इस तमन्ना में एक वली एक नेक इंसान ज़िन्दगी गुज़ार देता है और क़ब्र में जाता है तो तीन सवालात होते है।
(1) तेरा रब कौन है..?
(2) तेरा दीन क्या है ..?

अल्लाह का वली जवाब दे देता है मेरा रब अल्लाह है, 
मेरा दीन इस्लाम है, 
और जब सरकार क़ब्रे मुबारक में तशरीफ़ लाते हैं फ़रिश्ते पूछते हैं  (3) "तू इस शख़्स के बारे में दुनिया में क्या कहता था" 
तो वो अल्लाह का वली मुलाक़ात करता है अल्लाह के रसूलﷺ से और कहता है कि इन्ही के दीदार की तमन्ना में तो मैं जीता था इन्ही के दीदार की तमन्ना में मैं ज़िन्दगी का एक एक लम्हा गुजारता था हर सांस मेरी ये दुआ़ करती थी की मुस्त़फा जाने रहमतﷺ का दीदार हो जाये फिरिश्तों इन्हे नहीं पहचाना तो फिर क्या काम की ज़िन्दगी मेरी मैं तो सारी ज़िन्दगी इन्ही के नग्मे गाता रहा इन्ही के तज़्किरे करता रहा बे शाख्ता कहता है ये मुस्त़फा जाने रहमत है ये रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है ये मेरे आक़ा है मैं ज़मीन पर भी इनको आक़ा कहा करता था आज इनका दीदार कर रहा हूँ तो कहता हूँ।
मुस्त़फा जाने रहमत पे लाखो सलाम शम ए बज़्म ए हिदायत पे लाखो सलाम ।

वली से मुलाक़ात होती है नबी की इसलिए वो दिन उस वली के लिए सबसे बढ़ कर होता है और वो तारीख जिस तारीख में अल्लाह का वली अपने नबी का दीदार करता है चूंकि वो ख़ुशी का दिन है इसलिए उस दिन को *हम उर्स कहते हैं* चूंकि उस दिन हम ख़ुशी मुसर्रत करें और उस तारीख को जो उर्स की तारीख होती है उस दिन औलिया इकराम का फैज़ बढ़ जाता है।
 
*सरकार गौसे पाक* के उर्स की तारीख आती है लोग हज़ारो लाखों की तादाद में जाते हैं। 
*सरकार गरीब नवाज़* का उर्स होता है लोग हज़ारो लाखो की तादाद में जाते है।
*सरकार आला हज़रत* के उर्स की तारीख आती है लोग हज़ारो लाखों की तादाद में जाते हैं।
*हुज़ूर ताजुश्शरीअह* के उर्स की तारीख आती है लोग हज़ारो लाखों की तादाद में जाते हैं।
*इसलिए आशिक पुकारता है*
यह वो दर है जहां दिल नही तोड़े जाते।
*🤲 8वाॅ उर्स ए हुज़ूर ताजुश्शरीयह रहमतुल्लाह अलैह बहुत बहुत मुबारक*



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