बुज़ुर्गो (वली) के उर्स में दुआए रद्द नही होती

🏁🔴🏁🔴🏁🔴🏁🔴🏁🔴



*🥀 बुज़ुर्गो (वली) के उर्स में दुआए रद्द नही होती 🥀*



🔛 बारगाह ए वली में जो दुआ मांगी जाती है वो कभी रद्द नहीं होती आइए इस पर कुछ बताते हैं।
हज़रते आदम अ़लैहिस्सलाम की तख़लीक़ की अल्लाह पाक ने, हव्वा की भी तख़लीक़ हुई और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने दोनों से फ़रमाया जन्नत में रहो जो खाना है खाओ जो पीना है पीओ जो करना है करो, लेकिन सुनो ये दरख़्त के क़रीब मत जाना मुफ़स्सेरीन कहते है कि वो गंदुम का दरख़्त था गेंहू का दरख़्त था उसे खाने से मना किया गया आप हम सब जानते है की हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने भी उस दरख़्त से कुछ खाया और हव्वा ने भी खाया उसके बाद दोनों ज़मीन में उतार दिए गए तीन सौ कुछ साल तक ज़मीन में भटकते रहे पूरी दुनिया में सिर्फ ये दो इंसान है और कोई इंसान है ही नहीं

हज़रते हव्वा उतारी गई जद्दा में हज़रते आदम अ़लैहिस्सलाम उतारे गए श्रीलंका में अब पूरी दुनिया में दो इंसान है तो अंदाजा लगाइये एक दूसरे को तलाश करना इतना आसान नहीं होगा कोई पता बताने वाला नहीं है कोई ऐसी शख्सियत भी नहीं है जिससे पूछे की फलां कहा मिलेगा न कोई इलाका, न कोई इलाके के नाम, सिर्फ ये दुनिया है, और दुनिया में दो इंसान भटक रहे हैं।

अब भटकते रहे एक दूसरे को तलाश करते रहे हज़रत आदम अस्तगफार करते रहे अपनी लर्ज़िशों की माफिया मांगते रहे, तीन सौ कुछ साल के बाद त़ौबा क़बूल हुई, हज़रत आदम और हव्वा की एक जगह मुलाक़ात हुई, और जिस जगह ये दोनों मिले उस जगह का नाम रख दिया गया *अरफ़ात* "अरफ़ात" के लफ़्ज़ी मायने होते है *मुलाक़ात की जगह* मिलने वाली जगह, हज़रत आदम अलैस्सलाम ने कहा हव्वा अल्लाह ने तीन सौ साल के बाद हमें मिलाया, मैं चाहता हूँ कि आज की पूरी रात हम अल्लाह की इबादत में गुज़ारे, दोनों इबादत करते रहे रात भर अल्लाह का शुक्र अदा करते रहे।

रब को यह अदा पसंद आ गई फरमाया कि ऐ आदम हव्वा तीन सौ साल के बाद मिले मगर तुमने जो ज़रूरते होती है मर्द और औ़रत की उसकी तकमील नहीं कि मेरा शुक्र करते रहे मेरी इबादत करते रहे मेरे लिए तस्बीह बयान करते रहे, (अल्लाह को ये अदा पसंद आई) मैं आखरी उम्मत जब मबऊस करूँगा, नबी को भेजूंगा और जब हज फ़र्ज़ करूँगा तो उस उम्मत को अरफ़ात पर ठहरने का हुक्म दूंगा ताकि तुम्हारा ये ठहरना यादगार बन जाए तुम्हारी नस्ले इसको याद रखे आज तक याद रख रहे है कि हमारे बाप आदम हमारी माँ हव्वा मिली थी, और आक़ा ने कहा कि मेरे बाप आदम मिले मेरी माँ हव्वा मिली, उस ज़मीन की तासीर जानते हो लोगो ने कहा अल्लाह रसूल बेहतर जाने, सुनो जहां आदम और हव्वा मिले वो जगह अरफ़ात कहलाई, और उस जगह की तासीर ये हो गई कि जो दुआ़ मांगे (हाजी) अल्लाह रद्द नहीं फरमाता है, जो इल्तेजा करे हाजी, अल्लाह रद्द नहीं फरमाता है, जो तमन्ना करे वह हाजी, अल्लाह रद्द नहीं फरमाता है

तो बात समझ आ गई एक मामूली जगह हुआ करती थी मगर आदम और हव्वा की मुलाक़ात ने उस ज़मीन में ये तासीर पैदा करदी की उस जगह अब *दुआ़ए रद्द नहीं होती* ....
तो आदम थे नबी हव्वा थी वलिया *जहां एक नबी और वली की मुलाक़ात हो जाए तो वो जगह दुआ़ओ की मक़बूलिय्यत की जगह हो जाती है,* जब इस उम्मत का एक वली क़ब्र में जाता है मुस्त़फा ﷺ तशरीफ़ लाते है नबी और वली की मुलाक़ात हो जाती है ज़मीन में तासीर पैदा हो जाती है, अब जो दुआ़ मांगो रद्द नहीं की जाती !
ये है उर्स की अहमिय्यत ......
*🤲 8वाॅ उर्स ए हुज़ूर ताजुश्शरीयह रहमतुल्लाह अलैह बहुत बहुत मुबारक हो*



👑👑👑👑👑👑👑👑👑👑
*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
https://chat.whatsapp.com/I3NIYUqgOmvBN2r8fDzqIH

Comments

Popular posts from this blog

आगर पीरे कामिल ज़िंदा हो तो किसी और पीरे कामिल से तालिब हुआ जा सकता है क्या उसके लिए अपने शैख़ से इजाज़त लेना ज़रूरी है*

उर्स का मतलब क्या होता है और इसका मनाना कैसा है*

Mazar Shareef Par Haazir Ho Kar Dua Karna Kaisa Hai*